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मेरा घर सलामत रहने दो।

                
                                                         
                            मेरा घर सलामत रहने दो।
                                                                 
                            

तुम्हें तुम्हारे हिस्से की जमीन है हासिल
मेरा घर उजाड़ तुम अपनी इमारत खड़ी करो
कब तक सहूंगी यह अन्याय
बदल संग मिलकर मर लूंगी न्याय
तुम लिख देना भूस्खलन।
तुम्हें तुम्हारे हिस्से का जल है हासिल
मेरा घर उजाड़ तुम अपनी बाँध खड़ी करो
क्यों सहूं मै अन्याय
बादल संग मिलकर कर लूंगी न्याय
तुम लिख देना बाढ़।
तुम्हारे हिस्से का पानी पीने को है हासिल
मेरे घर को गंदगी से भर तुम पवित्र होना चाहे
मेरे बादलों को धुएं से भर तुम ऐश करना चाहे
मै क्यों अनंत बहती जाऊँ
तुम भरते रहो बोतलें।
मै खिलती रही रंग बिरंगी हर जगह तुम्हारे लिए
तुम सीमेंट से भरते रहे कोने कोने
खुशबू भी छिन गई, मधु मक्खी भी
भँवरे भी ओझल, इश्क के फूल भी
तुम प्लास्टिक के निर्जीव फूलों से रंग लो दुनिया।
मै निडर घूमता था घने जंगलों में, कि आना कभी
तुमने मेरी घर उजाड़, मुझे बांध दी सलाखों में
तुमने खिलौना समझा जीवित पशु पक्षी नहीं
याद ह, तुम्हें भी बांध, खेतों में काम लेते थे?
और आज तुम ज़ू कह कर झटक लेते हो?
तुम अपनी घर बसाना चाहते हो
दूसरों का घर उजड़ने न दो।
जो है, उपलब्ध स्थान सुविधाएं
दायरे में उनके खड़ी करो दीवारें
शान से कहना, यह उनका है, वह मेरा।
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2 महीने पहले

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