क्या वह सच था?
रह रह बुलाती है
वह घर , वह मैदान, वे दुकानें, वे गलियाँ
वह आँगन, वह कुँए की मुंडेर, वे पेड़ की डालियाँ
जबकि मै जानता हूं
हैं नहीं कुछ अब वहां
वैसी ही इमारतें हैं जैसे यहाँ।
रह रह कर आवाज देती हैं
दोस्तों का बुलावा, खेल में चीखना चिल्लाना
बिन पूछे आना और बिन कहे न जाना
जबकि मै जानता हूं
है कोई नहीं अब वहां
वैसे ही दूरियां हैं जैसे यहाँ।
मन तो चाहता है,
वह अल्हड़पन, वह बेबाकपन, वह बिंदास घूमना
वे कंधे जिन पर हाथ रख कर सूकून महसूस करना
हालांकि मै जानता हूं
उम्र ने सबके काँधे झुका दी
और पैरों को कर दी कमजोर।
दिल तो करता है
किसीके आने से धड़कन हो तेज
किसीके बात करने से उम्मीद बढ़े
किंतु मै जानता हूं
अक्सर यह नब्ज देती है धोखा
धड़कनों का कम है भरोसा।
पार की थी हौले से जीवन की पहली दूसरी पहर
अचानक अत्यंत तेज हो चली पहियों की रफ्तार
वे कोट, वे टाई, वे मीटिंग की चकाचौंध
चौड़े सीने से बहता गुरूर का था गंध
परंतु एहसास था यह भी मगर
उसी रफ़्तार से गुजरेगी तीसरी पहर।
और इस चौथी प्रहर की स्वर्णिम बेला में
पुकार तीव्र हो चली उस बागीचे से
जहां आम, लीची, शरीफा, चंपा, चमेली, उड़हुल
के झुरमुटों से दोस्तों की चहचहाने की आवाज
के बीच मां याद दिलाती, चाय ले जाओ '
फिर अचानक सिहर उठता क्या वह सच था?
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