कि मै, मै हो जाऊं
कभी जी करता है, कि मै, मै हो जाऊं
रोजमर्रा के आपा धापी में
मै कभी मददगार हूं, कभी खरीदार हूं
कभी चालक हूं, कभी यात्री
बस एक कार्य करनी है पूरी
उस दिन, उस समय, उस पल।
वह मै,
जो किसीसे भाग नहीं रहा
जो कुछ बन नहीं रहा
जो स्वयं को व्यस्तता में न ढूंढ रहा
वह मै,
जो एक पंछी को गोते लगाता देखता रहे
एक गिलहरी को सरपट रेंगता देखता रहे
एक वृद्ध नानी की झुर्रियों में जीवन देखे
वह मै, जो
एक गीत जो बचपन में सुनी, उसे गुनगुनाए
एक कप चाय में, हवा, जल, मिट्टी का एहसास करे
एक अलसाय दोपहर, हवा की झोंके से सो जाये।
वह मै,
उनके लिए सोचे, जो जीवन भर पानी ढोते रहे
उनके लिए करे, जो पुश्तों हल सा जूझते रहे
उनके लिए कहे, जिनकी ज़ुबां सदियों से नहीं खुले।
किंतु एक भय कचोटता है
कहीं सलाख टूट गए सदा के लिए
कुछ नहीं सोचने की सुविधा कहां
कुछ नहीं करने का आराम कहां
कुछ नहीं कहने का चैन कहां।
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