कहां था, कब था यह तस्वीर?
दूर वह देखो पेड़, सूरज की लालिमा में
विशालकाय व्यक्ति सा प्रतीत होता है
झुक कर डूबते सूरज का अभिवादन करते ।
उसने तुरंत अपनी फोन से तस्वीर खींची
पूछा, अच्छी आई है ना?
मैने लालिमा को झुर्रियों में उतार ली।
अरे देखो पहाड़ से वह विशाल पत्थर
ऊपर से लुढ़क रहा है, सड़क पर गिरेगा
देखो गाड़ियां तो नहीं कुचली जायेंगी?
उसने तुरंत अपनी फोन निकाल
कुछ बोलते हुए वीडियो बनाई
पूछा भेज दूं सबको?
मैने गिरते मलबे को सिहरन में बांध ली।
देखो उसकी मुस्कुराहट, नयनों की चंचलता
मानो पूछ रहा हो, गिरा दूं क्या इसे
झटक भी रहा है नन्हे बाहों को।
उसने अपनी फोन उठा
बच्चे को पुकारा, देखो इधर !
मैने गिरे हुए खिलौने को उठाया
उसकी नयनों की चमक को हृदय में छुपा ली।
अब हम मौन से देख, हृदय में उतारते नहीं
तुरंत, चित्रों ,चलचित्रों, में कैद कर
कभी फुर्सत मिले तो संग बैठ
गुज़रे हुए वक्त को जीने का प्रयास करते
पूछते कहां था, कब था?
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