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जीवन की बाती एक दिन बुझ जाती है

                
                                                         
                            जीवन की बाती जब जले।
                                                                 
                            

जीवन की बाती एक दिन बुझ जाती है
कभी इतलाह कर कभी अचानक
तभी स्मरण करते हैं,
कुल मिलाकर क्या था, क्या नहीं

तब तक वह एक शोर है
तब तक वह एक सफ़र है
जिसमें कुछ सुनाई नहीं पड़ता
जिसमें कुछ स्थिर नहीं रहता

ब्रह्मांड की विशाल परिपेक्ष्य
क्षणिक भी नहीं जीवन
कण भी नहीं जीवन
है परंतु दृष्टि ब्रह्मांड के सापेक्ष

अनेक पलसफे गढ़ता है
अनेक सिद्धांत स्थापित करता है
अनेक इतिहास रचता है
अनेक सेहरा बांधता है

प्रयास करता वह, करे स्वयं पर गर्व
की है वह इस धरती के लिए महत्वपूर्ण
है निःसंदेह उसका यहां सह अस्तित्व
अतः सदियों पत्थरों पर अंकित प्रतीक।

मंथन की उसने हजारों साल अंतः मन
कोई हो कारण इस संसार अवतरित तन
नहीं उत्तर अंतिम स्वरूप, कभी हुआ संभव
विधि अनेक, प्रयास स्वयं, अनुभव ही संभव।

कहां से करे लेखा जोखा हो पूर्ण
कौन सा दौर रहा महत्वपूर्ण
स्वयं के लिए जिया जो
दूसरों के लिए किया जो

जीते जी उनसे पूछा नहीं
जाने के उपरांत कोई कहा नहीं
हो सके तो लिख देना स्मरण जो आए
न जाने कल याद आए न आए।

जीवन की बाती एक दिन बुझ जाती है
कभी इतलाह कर कभी अचानक
तभी स्मरण करते हैं,
कुल मिलाकर क्या था, क्या नहीं।
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50 मिनट पहले

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