“संवाद की सरगम”
पुराने दिनों की बात में था दम,
जहाँ आज्ञा पालन होता था जीवन का धर्म।
श्रद्धा के रंगों से रंगे थे घर-परिवार,
वचनों में निष्ठा थी, बिन प्रश्न अपार।
बड़ों के इशारों पे चलते थे बच्चे बनकर आज्ञाकार,
बड़ों की सहमति से पनपते थे सब परिवार।
मगर अब समय ने चली नई चाल,
हर बात हो गई उलझन दार।
नई पीढ़ी है अब प्रश्नों की गठरी,
चाहती है स्पष्टीकरण हर बात का तभी।
अब हर आज्ञा को चाहिए तर्क का साथ,
अजी! यह बगावत नहीं, यह है चेतना का आभास।
युवा सोच की, है यह नई प्रेरणा,
जिन्हें आप मत समझिए अवहेलना।
अब बच्चे ढूँढते हैं हर बात में जानकारी,
उन्हें चाहिए अब विश्वास के साथ समझदारी।
जबरन दिशा-निर्देश से न सँवरें गे हालात,
भले घर का बंधन हो या समाज की बात।
अब अपनाओ तर्क और समझ का मार्ग,
स्वाल का जवाब दीजिए प्रेम के साथ।
तभी दिल से दिल जीत पाओगे विवेक के साथ,
तभी मिटेगा पीढ़ियों का यह संताप।
मातृत्व है शक्ति और सृष्टि का मूल,
स्नेह की छाँव में खिलते हैं प्रेम के फूल।
बिना मातृत्व के जीवन वीरान,
माँ का दुलार ही है असली वरदान।
संस्कारों की मजबूत जड़ों को थामिए,
चमकदार पश्चिमी मोह की असलीयत पहचानिए।
अपनी संस्कृति पर रखिए विश्वास,
तभी जीवन में होगा सच्चा प्रकाश।
संवाद की सरगम से विश्वास जगेगा,
तभी हर रिश्ते का संगीत बजेगा!
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