काँटों पर दौड़ते क़दम,
नज़रें गड़ी हैं भौतिक साँचों पर,
पर भीतर जल रही जीवंतता,
और नवीनता की असीम प्यास,
उद्देश्य को पाने की धुन में,
जान फूँक दी है हर साँस में।
दौड़ी, बस दौड़ी ही गई,
अपनों को पीछे छोड़ दिया,
एक पल रुककर सोचा ही नहीं—
क्या यह अकेली दौड़,
मेरी ही दुर्गा नहीं?
जो सिंह पर सवार,
अकेली ही लड़ी थी,
न कोई सेना, न कोई सहारा,
बस एक संकल्प,
और वह अकेली ही काफ़ी थी।
तो क्या मैं भी...
अकेली ही काफ़ी हूँ?
अब जाना है—
दौड़ोगी तो थक जाएँगे साथी,
पर उड़ोगी तो सबको पंख दे जाओगी।
तेरी सफलता कोई मीनार नहीं,
यह तो एक वट-वृक्ष बनेगी,
जिसकी छाँव में सब आ बसेंगे,
और तू...
तू हर पत्ते में साँस लेती रहेगी।
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