घर का आँगन, बाहर का जग, दोनों ही वह सँभालती,
प्रातःकाल से लेकर संध्या, हर मुश्किल को टालती।
दोहरी ज़िम्मेदारी का यह बोझ न मन पर भारी हो,
ऐसी एक व्यवस्था से अब, सुखद यात्रा नारी हो।
६ घंटे की ड्यूटी हो, २ बजे गृह-आगमन पाए,
स्थानांतरण से मुक्ति मिले, हर राह सुगम होती जाए।
बायोलॉजी का भेद समझकर, नया विधान बनाया जाए,
विशेष फ़ील्ड भर्ती देकर, नारी का मान बढ़ाया जाए।
८ घंटे पुरुषों के खातिर, समय-सीमा तय हो अब,
अत्यधिक कार्य के शोषण से, मुक्ति पाएँ मानव सब।
डिजिटल पन्नों पर दर्ज हो, ओवरटाइम का हर एक पल,
मेहनत का मिले अतिरिक्त दाम, बने सुनहरा नया कल।
नारी को सम्मान मिले, और पुरुष का भी स्वाभिमान रहे,
शोषणमुक्त हो कार्यक्षेत्र, हर चेहरे पर मुस्कान रहे।
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