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रिश्तों का पाठ्यक्रम — भाग १: 'लिमिटेड अटैचमेंट थ्योरी

                
                                                         
                            सास को सगी माँ बनाने चले थे,
                                                                 
                            
ज्ञान का नया दीया जलाने चले थे!
मगर भूल बैठे मुसीबत का लॉजिक,
चलाने ये झूठी मोहब्बत का मैजिक!
अगर सास में भी दिखे सगी माई,
तो असली माँ की फिर होगी विदाई!
दो माताओं का जो डेटा मिलेगा,
सॉफ्टवेयर बहुओं का कैसे चलेगा?
हुआ मान लो घर में कोई धमाका,
बुजुर्गों का उठना, दुखों का वो डाका!
तो बेटा तो रो-रो के बेहाल होगा,
बहू रो पड़ी तो बड़ा बवाल होगा!
पति भी पछाड़े, तो पत्नी भी तड़पे,
नैनों से बहते रहें आंसुओं के झरने!
तो पंडित की पूड़ी, वो टेंटों का खर्चा?
संभालेगा कौन ये दुनिया का पर्चा?
अगर दोनों डूबे रहेंगे ही गम में,
तो चाय कौन घोलेगा कम-ज्यादा शक्कर में?
रिश्तेदार जो आए हैं रोने-धोने,
उन्हें कौन भेजेगा कमरों के कोने?
इसीलिए ईश्वर ने गणित बैठाया,
इन-लॉज़ में थोड़ा सा डिस्टेंस बनाया!
सगे रोते बिलखते रहें बेधड़क जहाँ पर,
वहाँ इन-लॉज़ टिके रहें 'कूल' बनकर!
बहू को अगर सास से प्यार कम होगा,
तभी तो दुखों का ये लोड कम होगा!
पति का सिर अपनी गोद में रखकर,
वही तो संभालेगी 'स्ट्रांग' बनकर!
तो बंद करो यह 'अति-प्रेम' का ड्रामा,
सास को सास ही रहने दो भाई!
यह खट्टा-मीठापन दरार नहीं कोई,
ये कुदरत ने 'इमोशनल बैलेंस' की तरकीब बनाई!
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एक घंटा पहले

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