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हर्फ़-ए-अव्वल

                
                                                         
                            मेरी दुआ लगे बद्दुआ अता करने वालों को,
                                                                 
                            
मुझे रब करे, मेरे नाम का पहला हर्फ़ भुला दे उन्हें।

मेरे मालिक, ना ये शक्ल मुकम्मल बन पाए उनके ज़ेहन में,
मेरी नफ़रत करने का जज़्बात ही ना रहे उनमें।

मेरे मालिक, ऐसे भी हो कुछ लहज़े,
कि मेरे वजूद का एक भी जुज़्व याद न आए उन्हें।

उनकी नज़रों से मेरा अक्स ऐसे खो जाए, जैसे शम्स के सामने कोई कोकब;
मेरी नफ़स उनके क़ल्ब में न लहराए, बस एक लहज़ा जो बीत गया।

उनकी तरीक़ों में मेरे क़दमों के निशान मिट जाएँ, जैसे रम्ल पे लिखी कोई हिकायत;
और मैं उनके लिए बस एक अजनबी रहूँ, जिससे कोई नज़र न मिले।

बस एक ख़ाली खला हो उनकी रूह में मेरे लिए,
और मैं मिट जाऊँ उनकी दुनिया से — ऐ ग़ैब, ऐसे कर दे।
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2 महीने पहले

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