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दिखावे की मिठास

                
                                                         
                            हमको अपने घर बुलाकर, वो औरों को रश्क कराते रहे,
                                                                 
                            
और हम नादान समझे,
वो पाक जज्बातों का इज़हार निभाते रहे।

हम खिंचे चले गए उनकी मुस्कुराहटों की छाँव में,
बेखबर थे कि हम तो महज़ एक मोहरा थे उनके दाँव में।

दिखावे का यह निमंत्रण, रिश्तों का नहीं, अहम् का खेल था,
दूसरों की आँखों में जलन जलाना ही उनका असली मेल था।

आत्मीयता का मुखौटा पहनकर, वो अपना कद नापते रहे,
हमारी सादगी पर अपनी चालाकी का रंग छापते रहे।

पर सच का सूरज छुपता नहीं, नकाब एक दिन उतर ही जाता है,
स्वार्थ से भरा हर संबंध, अपनी पहचान खुद बताता है।

पुण्य हो या पाप की शक्कर, ढोंग की चाशनी में मिठास कहाँ?
जहाँ नियत में खोट हो, वहाँ रूह का अहसास कहाँ?

खुली छोड़ दी जाए अगर चीनी, चाहे जैसी भी उसकी ज़ात हो,
उसमें कीड़े पड़ना लाज़मी है, चाहे जितनी हसीं वो रात हो।

जो रिश्ते सिर्फ़ ज़माने को दिखाने के लिए सजाए जाते हैं,
दीमक की ज़द में आकर, वो अंदर से सड़कर बिखर जाते हैं।
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एक महीने पहले

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