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किस्मत को मैंने देखा

                
                                                         
                            किस्मत को मैंने देखा, एक सिक्का उछालकर,
                                                                 
                            
हँस पड़ा मैं ज़िंदगी पर, अपना दिल संभालकर।

राहों को मैंने देखा, आँधियों से टकराकर,
मंज़िल मिली मुझे फिर, अपने कदम बढ़ाकर।

वक़्त को मैंने परखा, हर दर्द को सहलाकर,
मुस्कुरा दिया मैं फिर, हर आँसू को छुपाकर।

चेहरों को मैंने पढ़ा, एक आईना बनाकर,
कुछ लोग मिल गए फिर, अपना मुझे बनाकर।

ख़्वाबों को मैंने सींचा, उम्मीदों से सजाकर,
फूलों में बदल दिया, काँटों को आज़माकर।

हारों को मैंने देखा, सबक़ अपना बनाकर,
जीतों को मैंने पाया, ख़ुद को नया बनाकर।

तक़दीर से कहा मैंने, अब खेल क्या दिखाएगी,
मेहनत की रोशनी से, हर रात ढल जाएगी।
सितारों को मैंने देखा, ज़मीं पर उतरकर,
इंसान वही चमका है, जो गिरा फिर संभलकर।

किस्मत को मैंने देखा, एक सिक्का उछालकर,
फिर अपनी राह चुनी मैंने, खुद को आज़माकर।
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3 महीने पहले

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