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लोकतंत्र की पावन ज़िद

                
                                                         
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अपनों की लाठी,अपनों के सर
लहूलुहान हर स्वाभिमान हैं
लोकतंत्र की बलि-वेदी पर
बहुत कम यह बलिदान हैं

मुद्दतों बाद वही मंज़र हैं
अंग्रेज़ों सा ज़ुल्म का अंबार हैं
गोरे तो कब के चले गए
पर अपनों में वही संस्कार हैं

सिर पर कफ़न बाँधकर आज
घरों से युवा सब निकल आए
संसद से सड़कों तक देखो
इंक़लाब के नारे गूंज आए

जो आज़ादी लहू से सींची
उसे छल से बेचने निकले हैं
कुर्सी के भूखे गद्दार कुछ
हमारे अधिकार छीनने निकले हैं

संविधान को सीने से लगाए,
हर शख्श यहाँ चट्टान बना हैं
लोकतंत्र के इस महासमर में,
हर नौजवान हिंदुस्तान बना हैं

सुन लो ऐ हिटलर के प्यादों
यह देश हमारा अपना हैं
इसकी रग-रग में बहता हैं जो
वह लहू हमारा अपना हैं

अब न कोई सुभाष, न भगत सिंह
कोई गांधी सा अवतारी हैं
लोकतंत्र को कभी न मिटने देंगे
यह हैं पावन ज़िद हमारी हैं


 
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33 मिनट पहले

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