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अँधेरों में रौशनी

                
                                                         
                            अँधेरों में रौशनी की क़ीमत पता चली
                                                                 
                            
कितनी है तुझसे हमको मोहब्बत पता चली

रौशन हुआ तिरे ख़्यालों से दयार-ए-दिल
किससे है मिरे दिल की ज़ीनत पता चली

छोड़ आए बाज़ार-ए-इश्क़ में सौदा-ए-वफा
बातें फरेब की गनीमत पता चलीं

माना किए थे नाखुदा उस नामुराद को
शुक्र है उसकी असल शख़्सियत पता चली

हम ही अकेले वारिस नहीं उनके शहर में
बहुतों में बाँटी है मिल्कियत पता चली

शक्ल-ओ-सूरत पे उनकी मर मिटे थे हम
सूरत से अलग उनकी सीरत पता चली
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एक घंटा पहले

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