नुक़सान ही होते हैं, कब नफ़ा होते हैं,
कितने वादे हैं जो फिर वफ़ा होते हैं।
एक तेरे एहसास की ख़ातिर, ऐ ‘शाद’,
कितने एहसास हैं जो ख़फ़ा होते हैं।
-फ़ौज़िया नसीम ‘शाद’
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