बात सच्ची अगर कही होती
हर किसी को भली लगी होती
काश मिलता बहार का मौसम
"हर कली यूँ न अधखिली होती"
गर मुहब्बत को वो समझ लेते
दिल में नफ़रत नहीं पली होती
दिल में होती न कोई बेचैनी
जब मुहब्बत की ज़िन्दगी होती
कोई मतलब निकाल भी लेते
मेरी तहरीर गर पढ़ी होती
देखना छोड़ते न ख़्वाबों को
कुछ हक़ीक़त अगर मिली होती
ज़िन्दगी से गिला नहीं होता
मेरे होंठों पे गर हँसी होती
ज़िक्र होता जो बरसरे-महफ़िल
मेरी आँखों में क्यूँ नमी होती
-फ़ौज़िया नसीम ‘शाद’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X