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इश्तिहारों का देश

                
                                                         
                            बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ,
                                                                 
                            
दीवारों पर नारा चिपका है।
घर के भीतर सच ये है कि,
उसका हर सपना बिकता है।

देवी कहकर पाँव पखारो,
फिर उसकी आवाज़ दबा देना।
इज़्ज़त के नाम पर ज़िंदा ही,
हर अरमान को जला देना।

जब दरिंदों ने जिस्म नोचा,
पूछा गया, "वह बाहर क्यों थी?"
किसी ने यह न पूछा उनसे,
दरिंदगी आख़िर ज़िंदा क्यों थी?

दहेज अगर कम पड़ जाए,
रिश्तों में मिट्टी का तेल बहे।
फिर अख़बारों की दो पंक्तियाँ,
और समाज निश्चिंत रहे।

कोख में बेटी मरती देखो,
मंदिर में कन्या-भोज भी है।
यह कैसा धर्म, कैसी श्रद्धा,
जहाँ हत्या भी, खोज भी है।

हर चौक-चौराहे चिल्लाते,
"नारी का सम्मान करो।"
पहले घर के बेटों से तो,
इंसानों-सा व्यवहार करो।

मत लिखो अब "यत्र नार्यस्तु...",
श्लोकों से पेट नहीं भरता।
जिस घर में बेटी डरकर जीए,
वह घर मंदिर नहीं, अँधेरा होता।

और सुनो ऐ सभ्य समाज,
इतना झूठ न बोला कर।
जिस दिन औरत निर्भय हँस दे,
उस दिन खुद पर गर्व किया कर।

- अक्षय कुमार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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