पथ के पगडंडियों पे।।
उजले धतूरे कुसुम खिले।।
पथिक के बाट जोहते।।
स्वेत हिरवन सी चक्षुसा के ।।
फूले न समाय सबेर के ।।
उधर से दौड़त जाय जिराफ।।
ऊंची - ऊंची पेड़वन के फिराक।।
वन - वन हरी पत्ती के खिलाफ।।
बसवन की टोली में बेखोफ।।
अनूठे पतली डंठल में छुपी।।
अनोखी मधुर स्वर लहरी।।
भोर दुपहर बांसुरी सांकेतिक
धुन बजाय के सांवरे।।
कौतुक कौलाहल की ध्वनि
सिर्फ उनका ही नाम पुकारे।।
तितर बटेर की
आपसी सामंजस्य
कौन तितर कौन बटेर।।
कैसे इनके रंगत से मिले सार ।।
चातक करे चाकरी
पंछी करे कलरवी गान
पीपल के शाखों पर
मोर पपीहरे की पिहूं पिहूं
उजले धतूरे कुसुम के।।
जूट जुटे बोरे में ।।
सूरजमुखी भये भास्करमुख
संझिया गई सखी की पगोट ।।
फाग आया मन की ओट ।।
हल्दियाई सांवरिया के मुखवट।।
महुआ मेंहदी अमवट की
खुशबू ले उड़ी उनकी सुर्ख
मंजरी की पछुवाई में ।।
कोकिल शुक बोले मन
की गठरिया में ।।
इस लुभावन बेला को
पिया तूने भुनाया क्यों ही।।
अब छोड़ चले गए क्यों ही ।।
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