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किस बात की रंजिश

                
                                                         
                            जाने किस बात
                                                                 
                            
से रंजिश हो तुम।।
जो भी तुम्हारी मायूसी
दिल के आईने में
छुपाये बैठी हो तुम।।
आजा मैं तेरे दिल
की सुनापन की
काट खोज रखा हूं
ऐसे कैसे जटिल
हो गई हो तुम।।
ये मुझे मालूम है
कि तेरे लायक
अब तक हो न
सका दिमाग में तुम।।
क्या मजाल कि
तुम्हें दुनियां घूर ले
शरारत भरी
निगाहों में तुम।।
ये जानकार दुनियां
भी ठिठक जाएगी
कि सभी उनका
नखरा दुःख
खुद मैने संभाल
लिया है तब फिर
कैसे प्रताड़ित
हुई जाओगी
कुछ दिनों के लिए
निगाहों की
बयां उधार
दे दो तुम।।
उस दिल का।।
कायल मैं था।।
पर उस दिल को
औरों ने निगाहों
में बसा लिया था।।
यह अत्योशोक्ति ही था।।
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2 महीने पहले

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