हालात के कुछ ऐसे मारे।।
गर जो बड़ों की करते।।
मनमाफिक बेफिक्री
और बात माना करते।।
आज हालात
कुछ ऐसे होते।।
कभी वो गर
खुदखुशी करते।।
तो संभाल लेते।।
उसकी तजरुबा
मगर ऐसे मोहब्बत।।
को नजर अंदाज
ही नहीं करते।।
अब तो हालात।।
ही बेशुमार होते।।
काश दुनियां के।।
रीति रिवाज में।।
ही न फंसते होते।।
हां तब किसी से।।
कोई मतलब ही न होते।।
यकीन मानो हालात
कुछ और होते।।
ऐसे में जीवन में।।
कुछ आवश्यकता न होते।।
इच्छा तो बिल्कुल
कुंठित हो ही जाते।।
पर मानो ऐसा।।
तब होता।।
जब परिवार,समाज का।।
दबाव न होता।।
हालात के कुछ ऐसे मारे
तब हालात तो
समझ से परे होता।।
घोड़ों की तरह
न लगाम होता।।
पंछी के जैसे।।
स्वछंद आसमां में।।
उड़ता होता।।
हालात कुछ ।।
और ही होता ।।
हालात के कुछ ।।
ऐसे मारे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X