धूप सी काया
दीप सा छाया।।
विचर रहा।।
घड़ी घड़ी वो सुरभि
खोता ही रहा।।
वह काया।।
निज को अकथ
हृदय की
गलन सी भाया।।
असुवनपात से अचल
की ओर अविरलता।।
विसर्जित मन ।।
दीप्ति पटल पर ।।
सांस वायु में घुलनशील
तरंगित विचलित ये मन।।
निकट आ रही विराम
यूं सिमट सिमट
शून्यता की ओर।।
अजीज को
लिए चल बिखरता।।
को समेट कर।।
विद्युत की दिधिति आफत
के बवंडर उड़न खटोला।।
पर सबके लिए
क्लांत ही दखल लाया।।
रीति में मृदु
परंपरा को धर।।
अज्ञानता की तमस में
दीप सी शिखा।।
नेह की सृजन करूंगा
कोल की खान।।
से हीरे सी चुन।।
छांह की आर में
प्राण कैसे उन्मत
धूप सी काया
दीप सा छाया।।
विचर रहा।।
घड़ी घड़ी वो सुरभि
खोता ही रहा।।
वह काया।।
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