चक्षु के माध्यम।।
आत्मभारित ज्ञान मद्धिम।।
ज्ञान और वैराग अहम।।
कर्ण के छिद्र से होकर
ध्वनि स्पर्श करता चर्म।।
प्रति ध्वनि परब्रह्म का सुन।।
उस और दे न।।
पाता ध्यान।।
केंद्र के मध्य
बिंदु रूपी ज्योत।।
उस अनंत संरचना
में ओत प्रोत।।
भीतर से बाहर
उन अनंत में।।
कई विशेषताओं
की भ्रम।।
संज्ञा पे संज्ञा सजी।।
दिखता इधर उधर
कहीं नहीं ।।
अनंत उस ब्योम में।।
इतनी सूक्ष्म।।
इस देह में दिखता।।
किधर है
कोई उसे क्यों
नहीं दिखाता।। चक्षु के माध्यम।।
आत्मभारित ज्ञान मद्धिम।।
ज्ञान और वैराग अहम।।
कर्ण के छिद्र से होकर
ध्वनि स्पर्श करता चर्म ।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X