अब बस भी करो सनम, कहीं ऐसा ना सो छलक जाए एक दिन सब्र का जाम,
मैं तुम्हारे इंगनोर करने के रवैए से भरा पड़ा हूं सनम,
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X