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खुशियाँ आंचल महकाये

                
                                                         
                            सुक्ष्म नजरों से मोती पिरोते रहो
                                                                 
                            
होंगे मोतियन की माला कभी ना कभी।

ख्वाब ही तो कभी गम के शोले बने
शोले तिल-तिल जलाये कभी ना कभी।

रूठ जाने से कुछ भी तो मिलता नहीं
आंखें आंसुवन बहाये कभी ना कभी।

जिन आंचल को फैलाये लेती दुआ
खुशबू आंचल महकाये कभी ना कभी।

रूप-रंगों की इतनी ना तारीफ करो
नाज नखरे बहकाये कभी ना कभी।

जिनकी नजरों ने देखी है दुनिया जहाँ
वे बनेंगे नियंता कभी ना कभी।

जिस घर में बने ज्ञान की बातियां
ज्ञान- दीपक जलेंगे कभी ना कभी।

जिसने कांटों पे चलने की खाई कसम
उनको मंजिल मिलेंगे कभी ना कभी।
- दिवाकर ओझा "
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3 महीने पहले

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