यह खेत जो है लहरा रही,
किसान को यह बतला रही,
कि अब तू जा भोजन करने,
तेरी थाली तुझे बुला रही।
जब अन्न का एक दाना,
हमारे कंठ से उतरता है,
उस वक्त वो बतलाता उस कठिन समय को,
जिससे किसान गुजरता है।
अब वो अन्न हमारे शरीर में मिलकर,
प्रदान करेगी हमें ऊर्जा।
पर उस अन्न को उगाते समय किसान के अंग,
काम करते थे जैसे हो किसी मशीन का पुर्जा।
अब शपथ लेना चाहिए हम सबको कि,
भुखमरी कभी न आने देंगे,
और आने वाली पीढ़ी को चैन से,
जीवन जैसा त्योहार मनाने देंगे।
— दिव्य डनसेना
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