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हमारा संविधान

                
                                                         
                            गणतंत्र के मंदिर का
                                                                 
                            
संविधान ही भगवान है,
हम सब के दिल में बसता
अपना हिन्दुस्तान है।

प्रेम, अहिंसा के पुष्पों से सुगंधित
लोकतंत्र का कोना-कोना है,
असफल होगा उसका प्रयास
जिसका मकसद नफरत के कांटे बोना है।

आज भी कुछ गद्दार लगे
हमारा गणतंत्र मिटाने में,
आपस में हमें लड़ाकर अपनी
तानाशाही चलाने में।

इन काले अंग्रेजों से अब
हमें दो-दो हाथ करना होगा,
संविधान पकड़ कर हाथों में
अब हमें आगे बढ़ना होगा।

चरम-उत्कर्ष नहीं है गणतंत्र का
अभी तो यह शुरुआत है,
कुछ राह अभी तय की हमने
और अभी बहुत दूर-तलक की बात है।

आओ अपने संविधान के
सपनों का गणतंत्र साकार करें,
धर्म-मज़हब को भूलाकर हम
हर हिन्दुस्तानी से प्यार करें।

 दिनेश यादव


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6 वर्ष पहले

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