एक फूल और कुछ यादें
एक फूल और कुछ यादें, संभाले बैठा हूँ,
तेरे जाने का हर ग़म, छुपाए बैठा हूँ।
वो फूल जो कभी तेरे हाथों से मिला था,
आज भी उसे सीने से लगाए बैठा हूँ।
पंखुड़ियाँ सूख गईं, रंग भी खो गया है,
फिर भी उसमें तेरा एहसास पाए बैठा हूँ।
तू लौटकर आएगा—ये उम्मीद नहीं है,
फिर भी दरवाज़ा दिल का सजाए बैठा हूँ।
कुछ बातें थीं जो तुझसे कह नहीं पाया,
वो बातें आज तक दिल में दबाए बैठा हूँ।
तू भूल गया होगा वो गुज़रे हुए लम्हे,
मैं हर लम्हे को आँखों में बसाए बैठा हूँ।
रिश्ता तो हमारा कब का खत्म हो चुका है,
पर तेरी यादों से रिश्ता निभाए बैठा हूँ।
लोग पूछते हैं—“किसका इंतज़ार है अब भी?”
मैं मुस्कुराकर अपना दर्द छुपाए बैठा हूँ।
मुरझाया हुआ फूल कहता है यही मुझसे—
“कुछ लोग बिछड़कर भी कहाँ जाते हैं दिल से…”
इसी एक बात को सच मानकर शायद,
मैं अपनी तन्हाई को गले लगाए बैठा हूँ।
एक फूल और कुछ यादें, संभाले बैठा हूँ,
तेरे जाने का हर ग़म, छुपाए बैठा हूँ।
-दिनेश उनियाल
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