भूत होते हैं क्या?....
एक व्यंग्यात्मक कविता
भूत होते हैं क्या?
सवाल बड़ा गंभीर है,
किसी के लिए हकीकत,
किसी के लिए सिर्फ़ तसवीर है!
जो जानते हैं—कहते हैं,
“हाँ साहब! भूत होते हैं!”
जो नहीं जानते—हँसकर कहते,
“अरे छोड़ो, ये भी कोई बात है!”
एक कहता—“मैंने देखा था,
आधी रात को पीपल के नीचे!”
दूसरा बोला—“भाई,
तुम थे होश में या नशे में?”
पहला बोला—“सफेद कपड़े थे,
हवा में बाल लहरा रहे थे!”
दूसरा बोला—“अरे मूर्ख!
वो तो शर्मा जी थे,
सुबह की सैर को जा रहे थे!”
वाह रे इंसान!
जिसे समझ न पाए—उसे भूत बना दिया,
जिसका जवाब न मिला—उसे रहस्य बना दिया!
किसी ने कहा—“रात आवाज़ आई,
कोई दीवार के पीछे रोया।”
दूसरा बोला—“भूत होगा!”
तीसरा बोला—“पहले देखो,
पड़ोसी का बच्चा तो नहीं सोया!”
बाबा बोले—“भूत भगाएँगे!”
पंडित बोले—“पूजा करवाओ!”
डॉक्टर बोले—“डर कम करो!”
और दुकानदार बोला—
“पहले मेरी अगरबत्ती तो खरीदो,
फिर भूत को बुलाओ!”
वैज्ञानिक पूछते—
“भूत का प्रमाण कहाँ है?”
भूत शायद मन ही मन बोला—
“भाई, प्रमाण देने के लिए
पहले मुझे दिखाई तो देने दो!”
जो डरता है—उसे हर परछाईं भूत लगती है,
जो नहीं डरता—उसे वही परछाईं पेड़ लगती है।
दुनिया में भूत कम,
भूतों की कहानियाँ ज्यादा हैं,
और कहानियों से कम,
हमारी कल्पनाएँ ज्यादा हैं!
कभी भूत हवेली में मिलता है,
कभी पुराने कुएँ के पास,
और सबसे ज्यादा दिखाई देता है—
जब बिजली चली जाए
और घर में अकेले हों आप! 😄
तब बहादुर इंसान भी कहता है—
“हनुमान चालीसा कहाँ रखी है?”
और जो कल तक कहता था—
“भूत-वूत कुछ नहीं होते,”
वही सबसे पहले
दरवाज़े की कुंडी जाँचता है!
भूत है या भ्रम है—
इसका फैसला कौन करे?
जिसने देखा, वो डर रहा है,
जिसने नहीं देखा, वो बहस करे!
शायद असली भूत कोई और है—
जो दिखाई नहीं देता,
पर इंसान को भीतर से खाता है…
कभी डर का भूत,
कभी लालच का भूत,
कभी अहंकार का भूत,
कभी झूठ का भूत।
इन भूतों से कौन बचाएगा?
कौन मंत्र पढ़कर इन्हें भगाएगा?
इसलिए मेरे दोस्तों,
अगर कभी रात में भूत दिख जाए—
पहले घबराना मत,
थोड़ा ठहरकर देखना…
कहीं ऐसा तो नहीं—
भूत सामने खड़ा नहीं,
हमारा अपना डर
हमारे सामने खड़ा है!
और अगर भूत सच में मिल जाए…
तो उससे हाथ जोड़कर कहना—
“महाराज! आप तो रात में आते हैं,
हमसे तो इंसान दिन में ही डराते हैं!”
तालियाँ भूत के लिए नहीं,
उस इंसान के लिए बजाइए—
जो डर के अंधेरे में भी
सच की मशाल जलाए!
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