सुबह दोपहर शाम हो गई
सारी जिन्दगी आम हो गई.
इश्क मोहब्बत गुम हो गये
सिर्फ काम ही काम हो गई.
नींद अधूरी. ख्वाब अधूरे
हर पीठ पेट के नाम हो गई .
सफ़र अधूरा हरेक जिन्दगी
पता नहीं कब जाम हो गई.
चलते चलते ही उम्र गुजारी
बिन मंजिल नाकाम हो गई.
सारी उम्र सफ़र में ही बीती
सुबह से चलकर शाम हो गई.
-दिनेश चौहान
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