चलो उठाओ एक कमंडल टीका एक सजाओ माथे पर
निकल जाओ बस्ती के अन्दर राग उठाओ एक होंठों पर
सब्ज बाग उनको दिखलाओ ठग विद्या भी रोजगार एक
रोटी कपड़ा घर के खातिर सुबहो शाम उलझे लोगों पर.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X