ऋतु बदली मौसम बदला प्रकृति ने रूप स्वभाव बदल दिया
खिड़कियों पर लगे पर्दों का कलेवर भी धीरे-धीरे बदल गया
छज्जे की धूप सुहावनी लगने लगी, सीढ़ी छत की खुल गई
धूप में छुट्टियों के दिन बहस की बाते ,मन फिर बहल गया.
-दिनेश चौहान
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