नदी कभी नहीं मरती है
मरती है संस्कृति
नदी बढ़ती है तो उतरती है
तट की जिंदगी.
जब कभी वह सूखती है
सभ्यता घाट की तब सूखती है
नदी तो पत्थरों को तोड़
प्रेम सिक्त झरनों से निकलती है
पिपासा सैकड़ों दरख्तों की बुझाकर
मन्द मन्द बहती है
उन्माद में तट डुबो कर चलती है
नाराजगी जताई तो तट छोड़ बहती है
लेकिन हमेशा वह हमारे लिए ही
बहती है. निरन्तर बहती है.
-दिनेश चौहान
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