लोग जुटते हैं फिर बिखर जाते हैं
जरा सी बात पर बिफर जाते हैं.
सड़कें भरी फिर खाली भी हुईं
लौट कर फिर उसी घर आते हैं.
चीखते रहे जान हथेली पर ले
बाद में मेमने सा चुप हो जाते हैं.
कोई किसी का दुश्मन नहीं होता
फिर भी खूंखार सब हो जाते हैं.
चाल बेईमानी जालसाजी की चली
बीच अपनों के दीवार उठ जाती है.
लोग जुटते हैं और बिखर जाते सब
बात मेले की हो खुशियां ले जाते हैं.
-दिनेश चौहान
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