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किलों को भी ढहना पड़ता है

                
                                                         
                            जब करोड़ो दिलों में आग जल रही हो
                                                                 
                            
बेईमानी की तस्वीरें मनों में पल रहीं हो
मूक बैठे हुये हो जिम्मेदार वे सारे लोग
शकुनी की चालें धोखे की चल रही हों.
ऐसे में कलियों को रौंदा जा रहा हो
भूख में रियाया को रखा जा रहा हो
हक आदमी का किसी और को मिले
दुर्योधन का अंत लिखता जा रहा हो.
दिन कितने चलेगी मनमानी सत्ता की
संघर्ष में हो बात जीविका और भत्ता की
लौह स्तम्भों को भी तब झुकना पड़ता है
अजेय किलों को भी तब ढहना पड़ता है.
-दिनेश चौहान
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3 महीने पहले

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