दाल रोटी में फँसे कुछ रात दिन ऐसे
काँच के टुकड़े फँसे हों घाव में जैसे.
चाँद तारे संग सूरज ये बदलते मौसम
कुछ नजर आते नहीं अब भाव में कैसे ?
-दिनेश चौहान
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