बस ट्रेनों में चलना दूभर नहीं कहीं आराम
कॉकरोच सब घर को लौटे जीना हुआ हराम .
जंतर मंतर सूना दिखता मरघट जैसी शान्ति
बजा बिगुल सब चले गए छेड़कर एक क्रांति.
-दिनेश चौहान
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