हर बार यहाँ यही होता है
कभी बाबा कभी पोता है.
बाप को सत्ता यदि मिली
कुर्सी पर बेटा भी सोता है.
मण्डली चोरों की बनीं तो
कीर्तन फिर चंदे से होता है.
पैसा मन्दिर का चढ़ावे वाला
भक्त देता, भक्त ही लेता है.
नीति पीछे , राज आगे हुआ तो
बाबा भी कुर्सी का मजा लेता है.
धर्म वो पर्दा है जो बचा देता है
हमाम में नंगा हर कोई होता है.
-दिनेश चौहान
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