आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हर बार यही होता है

                
                                                         
                            हर बार यहाँ यही होता है
                                                                 
                            
कभी बाबा कभी पोता है.

बाप को सत्ता यदि मिली
कुर्सी पर बेटा भी सोता है.

मण्डली चोरों की बनीं तो
कीर्तन फिर चंदे से होता है.

पैसा मन्दिर का चढ़ावे वाला
भक्त देता, भक्त ही लेता है.

नीति पीछे , राज आगे हुआ तो
बाबा भी कुर्सी का मजा लेता है.

धर्म वो पर्दा है जो बचा देता है
हमाम में नंगा हर कोई होता है.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर