हर बार तुम्हें खोया मैंने
खोकर तुझको रोया मैंने
लडियां यादों की टूट गईं
जी भर के तब सोया मैंने.
पत्तों सा टूटा बिखर गया
तूफान से मिल निखर गया
जब भी लहरों से टकराया
मंजिल को तब खोया मैंने.
घाटों से नजरें मिली नहीं
लहरों सी किस्मत बही नहीं
तिनकों सा भंवरों में घूमा
नहीं कोई ठिकाना पाया मैंने.
हर समय हाथ आ फिसल गया
दुर्भाग्य देख दिल दहल गया
पथ पर काटों से उलझा इतना
धोखा प्रति पग खाया मैंने.
-दिनेश चौहान
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