शाम होगी रात होगी
दुःखों की बरसात होगी
धीर मन में रखना
भोर की शुरुआत होगी
पट हिलेगें द्वार के
फिर नई सुबह होगी.
नींद आयेगी नहीं पर
ठण्ड आयेगी वहीं पर
बूंद संग बौछार लेकर
देह की सौगात होगी
कंपकपायेंगे होंठ ये
फिर नई सुबह होगी.
पीठ के संग पेट होगा
न्याय सारा लेट होगा
परिजनों की भीड़ भी
पास होकर दूर होगी
क्षितिज से उगती किरण
फिर नई सुबह होगी.
-दिनेश चौहान
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