टंगे हुये चमगादड़ से उल्टे लोगों को क्या कहना
हुई रोशनी अंधे हो गये , काली रातों संग उड़ना.
मौसम जैसे लोग भी बदले देख हवा का रुख बदला
कुछ भेड़ों के संग चलने से शेर ने छोड़ दिया लड़ना.
बिजली कड़की मेघा बरसे उफनायीं नदियाँ सारी
घाटों ने भी देख लिया है बाढ़ के पानी का बढ़ना.
दूर क्षितिज से सारी आंखें एकटक हमको देख रहीं
हालातों से जूझ जूझ कर मिलकर हमको है भिड़ना.
देश हमारा धरती अपनी कण कण की सौगंध हमें
धार वक़्त की देख के चलना शिखरों पर है चढ़ना.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X