क्या बत्तीस दरिंदों को होगी फाँसी?
या फिर कानून फिर सो जाएगा?
निर्दोष बचपन का रक्त बहाकर,
कोई अपराधी फिर मुस्काएगा?
माँ की गोद में जो कलियाँ थीं,
आज भय में सहमी जाती हैं।
विद्यालय की राहों पर भी,
कितनी आँखें डरती जाती हैं।
किसे कहें अब रक्षक अपना,
जब भेड़िए चेहरों में बसते हैं।
मानव होकर दानव बनकर,
मासूम सपनों को डसते हैं।
ओ माता-पिता! जागो अब,
सिर्फ दुलार ही पर्याप्त नहीं।
संस्कारों का दीप जलाओ,
सतर्कता से बढ़कर शक्ति नहीं।
बेटी को साहस भी देना,
बेटे को मर्यादा सिखलाना।
नारी का सम्मान ही जीवन है,
यह हर बच्चे को समझाना।
मोबाइल की अंधी दुनिया में,
मत बचपन को खोने देना।
अपनेपन का स्पर्श बचाकर,
संवादों को सोने देना।
अच्छा-बुरा पहचान सके वह,
इतना विवेक जगाइए।
किसी अनजाने लालच में,
अपने फूल न मुरझाइए।
विद्यालय, घर और समाज,
सबको प्रहरी बनना होगा।
चुप्पी अपराधों की साथी है,
अब खुलकर सच कहना होगा।
दुष्कर्मी चाहे कोई भी हो,
जाति-धर्म से ऊपर न्याय।
दोष सिद्ध हो जाए यदि तो,
कठोर दंड मिले तत्काल।
क्या बत्तीस दरिंदों को होगी फाँसी?
यह प्रश्न हवा में नहीं रहना चाहिए।
हर पीड़ित बेटी के आँसू का,
उत्तर न्याय में मिलना चाहिए।
जब तक भय अपराधी के मन में,
स्थायी रूप से बसता नहीं;
तब तक मानवता का माथा,
इन कलंकों से धुलता नहीं।
आओ ऐसा देश बनाएँ,
जहाँ हर बेटी निर्भय हँसे।
माँ की आँखों में विश्वास खिले,
हर घर में फिर उजियारा बसे।
न्याय कठोर हो, शीघ्र भी हो,
द्विज समय की यही पुकार है।
बेटी की रक्षा, मानवता की रक्षा,
यही हम सबका धर्म-संस्कार है।
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