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शहर का अंधेरा

                
                                                         
                            उस चुंधियाती रोशनी में हमारे भी ख्वाब पल बैठे।
                                                                 
                            
ओरो की बाहरी तररकी देखकर हम भी उस ओर चल बैठे।
अपने उसुलो को तोड़ते हुए खुद से ही लड़ते जा रहे थे।
हम शहर के अंधेरे में बढ़ते जा रहे थे।

भागती हुई जिंदगी का हमने भी थाम लिया था हाथ।
अपनों से दूर होकर गैरो का दे रहे थे साथ।
रिश्तों की पहचान में पिछड़ते जा रहे थे।
हम शहर के अंधेरे में बढ़ते जा रहे थे।

शहर की हवा में गांव की खुशबू भूल गए थे।
खुद को बदल कर नकली पहचान में मिलजुल गए थे।
झुटो ओर मतलबियो के दलदल में गड़ते जा रहे थे।
हम शहर के अंधेरे में बढ़ते जा रहे थे।

झटपट ऊंचाई पर पहुंचने का लालच सिर ताने था।
पैसों का अंबार लगाने का ख्वाब मन पाले था।
दिखावटी दुनिया की परिभाषा गड़ते जा रहे थे।
हम शहर के अंधेरे में बढ़ते जा रहे थे।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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