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दर्पण

                
                                                         
                            शायद मेरा आंगन था एक चौपाल
                                                                 
                            
पुरानी कुर्सियां एक फटा तिरपाल
चाय की चुस्की और लोगों का ज्ञान
मेरी अनेक त्रुटियां, उनके समाधान
घर में आते थे रौनक लगाते थे लोग
मेरे हर काम पर आलोचना की चोट
एक दिन गया था यूं बाजार में घूमने
ले आया दर्पण खुद का मुंह देखने
टंगा भूलवश आंगन की दीवार पर
भीड़ गायब हुई सहसा चौपाल पर
गलतियां मेरी खुद-ब-खुद खो गईं
लोगों की जुबान अब बंद हो गई
एक दर्पण ने सबको चेहरा दिखा दिया।
मैं जी रहा था ग्लानि में, मुझे जगा दिया।।
-धीरज सारस्वत
 
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2 महीने पहले

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