सरहद की हसीन वादियों में
जाने कितने ही गुमनाम किस्से
बर्फ की चादर ओढ़े बैठे हैं,
शीत, बसंत, गर्मी, बारिश, ओले, उनके लिये
इन सबका कोई मायने नहीं
अब वो जागने वाले नहीं,
उनको जगाने वाले,
बैठे हैं किसी गर्म कम्बल की आड़ में
शरहद पार से निकली चिनगारी,
एक जवान को शहीद बना देती है
उसके सीने से निकलता रक्त बर्फ से ढ़क जाता है
उस चिनगारी का मुक़ाबला करने के लिये
जो आग दिल में दहकती है,
उस पर रहनुमाओं की सांत्वनिक टिप्पणियों की बर्फीली परतें जमती रहती हैं।
लहू से लाल धरती अब सफेद हो चुकी होती है
उस बर्फ को पिघलाने वाली आग अब नहीं बचती,
वो बर्फ नहीं पिघलती,
रंगों में दौड़ता वो लहू जम जाता है,
वो आग दिल में दफ़न हो जाती है,
वो बर्फीली चादर नहीं हटती…कभी नहीं।
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