कितना सुंदर, कितना मनहर,
कितनी मधुर, सुहानी रे।
शनैः-शनैः झूमे हर डाली,
जैसे नदिया का पानी रे।
खुशियों से मन झूम उठा,
भूल गया हर परेशानी रे।
हरी चुनरिया ओढ़ के आई,
सब ऋतुओं की रानी रे॥
भौरों का गुंजन बारी में,
कोयल का कुंजन झाड़ी में।
खुशियों से प्रफुल्लित होता,
जाकर माली फुलवारी में।
थम जाए यह पल, मैं सोचूँ,
सुन कोयल की वाणी रे।
हरी चुनरिया ओढ़ के आई,
सब ऋतुओं की रानी रे॥
नई कोंपल पाकर पौधे,
फूले नहीं समाते हैं।
अपने मीठे स्वर में चिड़ियाँ,
फुदक-फुदक कर गाते हैं।
बहे वसंती पवन सन-सन,
जैसे झरने का पानी रे।
हरी चुनरिया ओढ़ के आई,
सब ऋतुओं की रानी रे॥
हर उपवन के सुमन सारे,
इठलाते, बलखाते हैं।
हरी-भरी फसलें देखकर,
सरसों, अलसी शरमाते हैं।
हर पौधे में नई पत्तियाँ,
लगे नवीन परिधानी रे।
हरी चुनरिया ओढ़ के आई,
सब ऋतुओं की रानी रे॥
-धर्मेन्द्र कुमार
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