लहरों पर महल
जब मन विचलित हो या हताश,
विफलता मन को करे उदास,
तब बैठो न होकर निराश,
तुम धैर्य रखो कुछ पाने की,
लहरों पर महल बनाने की।
जब दग्ध हृदय हो बारंबार,
उम्मीदों पर जब हो प्रहार,
फिर उठ खड़े हो एक बार,
नीर, ढूँढ़ो प्यास बुझाने की,
लहरों पर महल बनाने की।
जब थक जाए मन हारकर,
बैठो न हाथ पसारकर,
संकीर्ण दुनिया को त्यागकर,
अपना साम्राज्य विस्तारकर,
सोचो नभ को छू जाने की,
लहरों पर महल बनाने की।
जब व्याकुल मन भटकेगा बन,
जब सब उम्मीदों पर लगे ग्रहण,
तब डटे रहो तुम भरकर दम,
रख, हौसला मंजिल पाने की,
लहरों पर महल बनाने की।i
-धर्मेन्द्र कुमार
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