हुंकार है जन-जन की,
व्यथित हर अंतर्मन की।
संघर्ष ही है जीवन,
देखो गति इस पवन की॥
मुश्किलों को पछाड़ चलो,
मशाल लेकर, यार चलो।
दुर्ग जुर्म का उखाड़ चलो॥
दिखा दो इस जहाँ को,
जगा दो स्वाभिमान को।
जब आँच आए आन पर,
कुर्बान कर दो जान को॥
वक्ष पीर का फाड़ चलो,
मशाल लेकर, यार चलो।
दुर्ग जुर्म का उखाड़ चलो॥
मिटा दो अंधकार को,
पहचानो अधिकार को।
खत्म कर दो जीवन से,
रूढ़िवादी विचार को॥
क्रोध नहीं, साहस लेकर,
अन्याय से ललकार चलो।
मशाल लेकर, यार चलो।
दुर्ग जुर्म का उखाड़ चलो॥
अब याचना नहीं, रण करो,
आगे बढ़ने का दृढ़ प्रण करो।
खुद अपने भाग्य के राजा बनो,
सिर पर स्वाभिमान का मुकुट धरो॥
तू सिंह-सा दहाड़ चलो,
मशाल लेकर, यार चलो।
दुर्ग जुर्म का उखाड़ चलो॥
-धर्मेन्द्र कुमार
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