जिनके कलम की नीव से मुशीबत टल जाती है।
जिनके कलम की तरकीव से किस्मत बदल जाती है।
जीवन के संघर्षों का मैं ही समीक्षक हूँ
हाँ,मैं एक शिक्षक हूँ ।
जिनके गोद में सृष्टि पलती है। जिनके इशारे पर प्रलय मचलती है।
जीवन के कर्तव्य पथ का मैं ही परीक्षक हूँ हाँ,मैं एक शिक्षक हूँ ।
जिनके कर्म रथ कभी न रुकती है।
जिनके चरणों में लाखों सिर झुकती है।
संस्कृति और सभ्यता का मैं ही रक्षक हूँ।
हाँ,मैं एक शिक्षक हूँ ।
जिनके वाणी से अमृत झरते हैं
जो राष्ट्र का निर्माण करते है
राष्ट्र के अदालत का मैं ही अधीक्षक हूँ
हाँ,मैं एक शिक्षक हूँ ।
- धर्मेन्द्र कुमार
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