आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

डर लगता है

                
                                                         
                            डर लगता है हँसने में,
                                                                 
                            
कहीं लोग पागल न समझें।
डर लगता है रोने में,
कहीं लोग जज़्बाती न समझें॥
डर लगता है मिलने में,
कहीं रिश्ता न जुड़ जाए।
डर लगता है कुछ कहने में,
कहीं मन का भेद न खुल जाए॥
डर लगता है सपना देखने में,
कहीं अधूरा न रह जाए।
डर लगता है हासिल करने में,
कहीं मेहनत का फल खो न जाए॥
डर लगता है कुछ बनने में,
कहीं किस्मत मुकर न जाए।
डर लगता है कुछ करने में,
कहीं लम्हा गुज़र न जाए॥
डर लगता है मंज़िल छूने में,
कहीं कदम फिसल न जाएँ।
डर लगता है जीने में,
कहीं दम निकल न जाए॥
— धर्मेन्द्र कुमार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर