डर लगता है हँसने में,
कहीं लोग पागल न समझें।
डर लगता है रोने में,
कहीं लोग जज़्बाती न समझें॥
डर लगता है मिलने में,
कहीं रिश्ता न जुड़ जाए।
डर लगता है कुछ कहने में,
कहीं मन का भेद न खुल जाए॥
डर लगता है सपना देखने में,
कहीं अधूरा न रह जाए।
डर लगता है हासिल करने में,
कहीं मेहनत का फल खो न जाए॥
डर लगता है कुछ बनने में,
कहीं किस्मत मुकर न जाए।
डर लगता है कुछ करने में,
कहीं लम्हा गुज़र न जाए॥
डर लगता है मंज़िल छूने में,
कहीं कदम फिसल न जाएँ।
डर लगता है जीने में,
कहीं दम निकल न जाए॥
— धर्मेन्द्र कुमार
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