ये जात - पात का भेद क्यों
अमीर गरीब मे द्वेष क्यों
मुठ्ठी की अंगुलीयों से हम
आपस में फिर क्लेश क्यों ।
गुलाब के साथ काटें भी हैं
अंतर सब ने बाटे भी हैं
प्रकृति की भिन्नता मनोरम है
हमारी विविधता तो अनुपम है।
समझो हमारा वर्गीकरण
कर्म जिसका आधार है
कोई ऊँचा कोई नीच कैसे हो गया
जब सबका समान अधिकार है।
ब्राह्मण ज्ञानी-ध्यानी है
वो मूर्ख है , जो अभिमानी है
क्षत्रिय का धर्म है रक्षा
इसकी उसकी सबकी सुरक्षा।
वैश्य व्यापार का पूरक है
प्रगति का वो पग-पग है
क्षूद्र तो कर्ता-धर्ता है
हर आवश्यकता का भर्ता है।
ये कितनी पारदर्शी व्यवस्था है
चार स्तम्भों की उत्तम व्यवस्था है
क्यों अपनी संस्कृति हम नही समझे
भेद -भाव से कुंठित मनोव्यथा है।
क्या जीवन-मृत्यु भेद करते हैं
क्या पशु-पशु से अंतर रखते हैं
क्या हम विवेकशून्य हो गये हैं
जो स्वयं को यूं ही विभाजित करते हैं।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
कमेंट
कमेंट X